स्कूल न जाने की भारी कीमत

विगत आपदाएं यही संकेत करती हैं कि लंबे समय तक स्कूलों के बंद रहने से बच्चों की जीवन भर की कमाई में कमी आ सकती है। समाज में असमानताओं और संसाधनों की कमी को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि कुछ लोगों को इसका ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ेगा। यह बात छिपी नहीं है, ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेने मे असमर्थता के कारण काॅलेज के छात्रों की दुखद आत्महत्या ने देश भर के खूब सुर्खिंया बटोरी है। पूरे भारत में समान रूप से गहरी, लेकिन मूक त्रासदी ने भारत के स्कूली बच्चों को बहुत प्रभावित किया है। ज्यादातर भारतीय बच्चों को स्कूल गए आठ महीने बीच चुके हैं और उनको हो रहे नुकसान सिर्फ शिक्षण से वंचित होने के नतीजों तक सीमित नहीं हैं। शोध बताते हैं कि अधिकांश बच्चों के लिए कमतर शिक्षण का मतलब पूरे जीवनकाल के लिए कम कमाई भी होना।


इसी साल प्रकाशित विश्व बैंक के एक शोध-पत्र से पता चलता है कि साल 2020 में स्कूलों के बंद होने से दक्षिण एशियाई बच्चे औसत 5813 डाॅलर की कमाई गंवा देंगे। वे आगे चलकर प्रतिवर्ष 319 डाॅलर कम कमाएंगे। इस पूरे क्षेत्र को करीब 800 अरब डाॅलर से अधिक की कीमत चुकाना पडेगी और इसमें भी भारत को इस नुकसान का आधे से अधिक वहन करना पडे़गा।


आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) द्वारा लगाए गए एक अन्य अनुमान के अनुसार, लाॅकडाउन की वजह से छात्रों को शिक्षण या पढ़ाई-लिखाई में जो नुकसान हुआ है, उसके कारण इसी सदी में भारत को लगभग 12.5 ट्रिलियन डाॅलर का नुकसान उठाना पडे़गा।
ऐसा नुकसान दुनिया में पहले भी हो चुका है। साल 2004 के एक शोध-पत्र के अनुसार, छात्रों के शिक्षण पर अगर द्वितीय विश्व युद्ध का असर न हुआ होता, तो 1980 के दशक में आॅस्ट्रिया और जर्मनी का सकल घरेलू उत्पाद अतिरिक्त रूप से 0.8 प्रतिशत अधिक हो सकता था। एक और मिसाल देखिए, 1980 के दशक में अर्जेंटीना में शिक्षकों की हड़ताल पर शोध हुआ था। हड़ताल की वजह से वे छात्र जब उम्र के तीसरे दशक में पहुंचे, तो उनकी वार्षिक कमाई सामान्य से लगभग तीन प्रतिशत तक कम थी।


पढ़ाई भूलती पीढ़ी
जब छात्र स्कूल नहीं जाते हैं, तब वे न केवल नई चीजें सीखना बंद कर देते हैं, बल्कि उन्होंने जो कुछ स्कूल में पहले सीखा था, उसे भी भूलने लगते हैं। जब स्कूल खुलेंगे, तो बच्चों के पास भरपाई के लिए समय नहीं बचेगा। महामारी से पहले ही दक्षिण एशिया में शिक्षा की गुणवत्ता इतनी खराब थी कि 12 साल की स्कूलिंग का मतलब सिर्फ 6.2 साल का प्रभावी शिक्षण होता था। अब विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, यह 5.5 साल तक और घट जाएगा।


किनको ज्यादा नुकसान
चूंकि भारत में पढ़ाई-लिखाई या स्कूलों के खुलने का समय आगे सरकता चला जा रहा है, इसलिए यहां बच्चों पर इसका दुष्प्रभाव भी बढ़ता जा रहा है। भविष्य में बच्चों की कमाई पर दुष्प्रभाव बढ़ता चला जाएगा। हालांकि, यह दुष्प्रभाव असमान होगा। अमीर मां-बाप औश्र अच्छी तरह से वित्त पोषित स्कूलों ने लाॅकडाउन के समय कमोबेश अपने बच्चों या छात्रों को होने वाले नुकसान को एक हद तक थाम लिया है। लेकिन जिन अभिभावकों के पास धन या संसाधन की कमी है, उनके बच्चों पर ज्यादा असर पड़ा है। कोरोना के समय में खासकर लड़कियों के साथ भेदभाव हुआ है और उन्हें पीछे कर दिया गया है।
जब गैर-लाभकारी संगठन ‘प्रथम’ ने साल 2018 में अपना वार्षिक सर्वेक्षण किया, तब सिर्फ 37 प्रतिशत ग्रामीण बच्चों के घर में ही एक स्मार्टफोन पाया गया था। अब इस सितंबर में 52227 ग्रामीण परिवारों के बीच सर्वे करके प्रथम ने बताया है कि महामारी के दौरन वह अनुपात बढ़कर 62 प्रतिशत तक पहुंच गया। मतलब, बहुत से परिवारों को बच्चों की पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन खरीदना पड़ा है। लेकिन अन्य बहुत से लोगों के बीच आज भी स्मार्टफोन की कमी है, जबकि स्मार्टफोन एक बुनियादी जरूरत बन चुका है।


अभिभावक और शिक्षक
कुछ अन्य कारक भी घर में रहते पढ़ाई-लिखाई को प्रभावित करते हैं। इसमें मां-बाप का सहयोग एक बड़ी भुमिका निभाता है। शिक्षित माता-पिता वाले 89 प्रतिशत बच्चों को घर पर पढ़ाई करने में मदद मिली है। कम शिक्षत माता-पिता के 55 प्रतिशत बच्चों को ही यह मदद मिल सकी है। ज्यादातर बच्चों को अपने बड़े भाई-बहन से पढ़ाई में मदद हासिल हुई है।
जहां शिक्षक सक्रिय या सजग थे, वहां उन्होंने छात्रों को होने वाले नुकसान को कम कर दिया। जब सर्वेक्षण हुआ, उसके पहले के सप्ताह में केवल 34 प्रतिशत बच्चों की अपने शिक्षक से भेंट हुई थी या शिक्षक का एक फोन आया था। यहां भी कम शिक्षित परिवार के बच्चे नुकसान में रहे। इस वर्ग के 25 प्रतिशत बच्चों के पास ही शिक्षक पहुंचे या शिक्षक का किसी न किसी कारण से फोन आया, जबकि इस वर्ग के बच्चों को शिक्षिकों की ज्यादा जरूरत थी।


सरकारी स्कूलों का हाल
हमारे ज्यादातर राज्य पहले से ही स्कूलों या स्कूली बच्चों की सहायता करने में खराब प्रदर्शन करते आए हैं। ऐनुअल स्टेटस आॅफ एजुकेशन रिपोट (एएसईआर) के अनुसार, पश्चिम बंगाल के सरकारी स्कूलों में कक्षा नौ और उससे ऊपर के छात्रों में से सिर्फ 20 प्रतिशत को स्कूल से शिक्षण की कोई सामग्री हासिल हुई। ध्यान रहे, यह एक ऐसा राज्य है, जहां 2018 के सर्वेक्षण के अनुसार, आठवीं कक्षा के 71 प्रतिशत बच्चों को भाग लगाना भी नहीं आता है।
बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 82 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि स्कूल से उन्हें किसी भी प्रकार की शिक्षण सामग्री हासिल नहीं हुई। आॅनलाइन क्लासेस की बात करें, तो सर्वेक्षण से पहले के सप्ताह में सिर्फ 10 प्रतिशत बच्चों को ही एक वीडियो या एक रिकाॅर्डेड वीडियो क्लास के दर्शन हुए थे। हालांकि, यह आंकड़ा पंजाब और गुजरात जैसे अपेक्षाकृत विकसित राज्यों में 50 प्रतिशत से अधिक था।


टीवी और रेडियो के जरिए आभासी कक्षाओं के प्रसारण के सरकारी प्रयास का भी सीमित प्रभाव पड़ा है। सिर्फ 20 प्रतिशत बच्चों के सर्वेक्षण बच्चों ने सर्वेक्षण से पहले सप्ताह में शिक्षण गतिविध्यिों के लिए टीवी का उपयोग किया, भले ही 61 प्रतिशत बच्चों के घर पर एक टीवी उपलब्ध था।
जब स्कूल फिर से खुलेंगे, तब भारत के सबसे वंचित बच्चों के लिए भरपाई करना बहुत मुश्किल होगा। ये बच्चे इस बार बहुत पीछे छूट गए हैं। जब तक समाधान के लिए कदम नहीं उठाए जाते, तब तक यही कहा जाएगा कि ये बच्चे अपने पूरे वयस्क जीवन में इसकी कीमत ठीक वैसे चुकाएंगे, जैसे पहले की आपदाओं में चुकाते आए हैं।
साभार- हिन्दुस्तान

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