बच्चों के लिए अब भी सहज नहीं हैं ऑनलाइन कक्षाएं

पिछले दिनों एक मित्र ने दिलचस्प बात बताई। उसके परिवार में छह-सात साल के दो बच्चे हैं। जब से कोरोना महामारी के कारण स्कूल बंद हुए हैं, बच्चे ऑनलाइन कक्षाओं के जरिए ही शिक्षा पा रहें है। उनके बच्चे भी ऑनलाइन पढ़ते हैं। एक दिन उन्होंने कहा कि उन्हें कोरोना हो गया है। आज वे नहीं पढेंगे। घर वाले बच्चों की बातें सुनकर चकित हुए। आखिर उनके दिमाग में ऐसा ख्याल आया कैसे? पता चला कि इन दिनों बच्चों के हाथों में मोबाइल लगातार रहता है और वे माता-पिता की बिना जानकारही के अपने दोस्तों से बातें करते रहते हैं। अब करें भी तो क्या, लगातार घर में रहने से वे ऊब भी गए हैं। बाहर का खेलना, कूदना, स्कूल की मोज-मस्ती, दोस्तों से रूठना-मटकना, सब कुछ तो बंद है। ऊपर से कई-कई घंटे की ऑनलाइन कक्षाओं में लगातार मोबाइल या लैपटाॅप के सामने उन्हें बैठे रहना पड़ता है। अब से पहले तो मोबाइन छूने की भी मनाही थी।


बताया जा रहा है कि ऑनलाइन कक्षाओं मेें बच्चों का मन भी नहीं लगता। वे पहले की तरह कक्षाओं में उपस्थित अपने दोस्तों से बातें नहीं कर पाते। इसलिए इन कक्षाओं से बचने का कोई न कोई बहाना ढूंढने लगे हैं। अध्यापक-अध्यापिका भी उन्हें कुछ कह  नहीं सकते। अगर वे बच्चों से इस बारे में पूछें भी कि वे कक्षा में क्यों नहीं आए, तो बच्चे कोई न कोई नया बहाना बना देते हैं। एक हालिया अध्ययन ने बताया है कि एक केंद्रीय विद्यालय की क्षा सात की ऑनलाइन क्लास में 52 बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन उपस्थित मात्र 22 ही थे। इसी तरह, एक निजी विद्यालय में कक्षा चार में 28 बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन उपस्थित 12 ही थे। फिर लगातार गैजेट्स के इस्तेमाल से भी मुश्किलें बढ़ रही हैं।


कुछ महीने पहले ही जयपुर के एक बड़े अस्पताल ने देश के 30 शहरों में एक ऑनलाइन सर्वे किया। इससे पता चला कि कोरोना-काल में बच्चों का गैजेट्स के प्रति रुझान तीन गुना बढ़ गया है। बच्चों को मोबाइल और कंप्यूटर की इतनी आदत पड़ गई है कि वे थोड़ी देर के लिए भी इसे अब छोड़ना नहीं चाहते। यदि माता-पिता मना करें, तो वे नाराज हो जाते हैं। जिद करने लगते हैं। उनकी बात नहीं मानते। अभिभावकों का कहना है  िकइस दौराना बच्चों का व्यवहार बहुत बदल गया है। घर में रहकर उन्हें अनुशासन सीखना चाहिए था, मगर वे तो अनुशासनहीन हो गए हैं। यदि माता-पिता उन्हें मोबाइल नहीं देते, तो वे ऑनलाइन कक्षाओं में  न जाने की धमकी देते हैं। जाहिर है, ऑनलाइन कक्षाओं के बाद भी गैजेट्स के लगातार इस्तेमाल के कारण बच्चों का न सिर्फ शारीरिक, बल्कि मानसिक स्वास्थय भी खराब हो रहा है। वे अधिक गुस्सा करने लगे हैं और चिडचिडे हो रहे है। बहुत से बच्चे दिन में भी उनींदे रहते हैं।  थकान महसूस करते हैं। यहां तक कि रात में भी उन्हें अच्छी नींद नहीं आ रही। वे अपनी पीठ और कलाई का दर्द की शिकायत करते है। घर में लगातार बैठे रहने, और हमेशा कुछ न कुछ खाते रहने के कारण स्कूली बच्चों का वनज भी तेजी से बढ़ने लगा है।


जहां एक ओर ऑनलाइन कक्षाएं इसलिए शुरू की गई थीं कि बच्चों की पढ़ाई का नुकसान न हों, वहीं दूसरी ओर देखा यह जा रहा है कि बहुत से बच्चों का पढ़ाई की इस शैली में मन ही मन नहीं लग रहा। फिर ऐसे बच्चे भी हैं, जिनके पास आॅनलाइन कक्षा के लिए जरूरी स्मार्टफोन या लैपटाॅप नहीं है। वे चाहकर भी इन कक्षाओं में उपस्थित नहीं रह सकते। ऐसी खबरें भी पढ़ने को मिली हैं कि बच्चे इन कक्षाओं में उपस्थित रह सकें, इसके लिए माता-पिता को घर का सामान तक बेचना पड़ रहा है। जो माता-पिता समय पर फीस नहीं दे रहे, कई स्कूल उनके बच्चों के लिए कक्षा का लिंक नहीं भेजे रहे। इससे जो बच्चे पड़ना चाहते हैं, उनका नुकसान भी हो रहा है।


कई स्कूलों के अधिकारियों का कहना है कि अगर हम फीस न लें, तो अपने अध्यापकों और कर्मचारियों का वेतन भुगतान कहां से करें? स्कूलों के अन्य खर्चे कैसे चलें? जो गरीब फीस नहीं दे सकते, उनके अलावा वे अभिभावक भी स्कूल की फीस नहीं देना चाहते, जिन्हें किसी तरह की कोई तंगी नहीं है। इसलिए उन बच्चों की आॅनलाइन कक्षा नहीं हो रही, जिनके माता-पिता फीस नहीं दे रहे हैं। साफ है, अपने देश के सहज ऑनलाइन कक्षाओं की राह अब भी दूर है।


(ये लेखक के अपने विचार हैं)


लेखक क्षमा शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)


साभार हिन्दुस्तान

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