बीस साल बाद की गुंजाइश


कुछ अध्ययनों से पता चला है कि अगर कोई बच्चा बीस साल तक पढ़ने के बाद किसी विश्वविद्यालय से निकलता है, तो उसकी सत्तर फीसदी बुद्धिमत्ता नष्ट हो चुकी होती है। इसकी वजह यह है कि हमने सूचना को ही शिक्षा समझ लिया है। अपने दिमाग को यदि कोई ढेर सारी सूचनाओं से भर कर मंद कर दे, तो बुद्धिमत्ता की संभावना निश्चित रूप से समाप्त हो जाती हैं, उस पर बाहर से एकत्रित की हुई चीजों का असर नहीं होना चाहिए। शिक्षा के स्वरूप और मकसद को समझें, तो व्यक्ति की सीमाओं का विस्तार होना चाहिए। मगर ज्यादातर जगहों पर ऐसा नहीं है। वहां बुद्धिमत्ता का कोई दूसरा आयाम नहीं होता। ज्ञान को भूलवश बुद्धि समझ लेना एक गंभीर गलती है। यह कुछ ऐसा है, मानो आप अपनी कार को चार की बजाय एक ही पहिये पर चलाने की कोशिश कर रहें हों। जो लोग ज्यादा शिक्षित नहीं हैं, वे एक साथ रह सकते हैं। मगर शिक्षित होने के बाद आप अलग-थलग हो जाते हैं, क्योंकि ज्ञान की प्रकृति यही है। ज्ञान सिर्फ याददाश्त के सहारे काम कर सकता है। दूसरे शब्दों में, आपका ज्ञान एकत्रित की गई सूचना के साथ काम करता है। अगर आपकी याददाश्त को हटा लिया जाए, तो आपका ज्ञान आपने आप में बेकार है। मगर आपके भीतर बुद्धिमत्ता के दूसरे आयाम होते हैं, जिन्हें याददाश्त के सहारे की जरूरत नहीं होती। अगर शिक्षा व्यवस्था बुद्धिमत्ता के इन आयामों को सक्रिय करने पर ध्यान नहीं देती, तो आप एक कार्यशक्ति तैयार कर सकते हैं, मगर प्रतिभाशाली लोग नहीं पैदा कर सकते।
    शिक्षा  प्रणाली से ज्यादा हमें उन लोगों को बेहतर बनाना होगा, जो उस व्यवस्था को संचालित करते हैं अगर हम ऐसा करें, तो हर प्रणाली ठीक काम करेगी। विद्यार्थी को सिर्फ सूचना ही नहीं, प्ररेणा की जरूरत होती है। शिक्षण को बेहतर बनाने की प्रक्रिया से निर्देशों को पूरी तरह निकाल देना चाहिए। इस बारे में एक रोचक तथ्य है कि तीस साल का व्यक्ति उस बच्चे जितने बुद्धिमान नहीं होता, जिसनें अब तक स्कूल जाना शुरू नहीं किया है। वह सिर्फ इसलिए स्मार्ट दिखता है, कि उसके पास सूचना अधिक होती है, जिसका दिखावा हम निर्देशों के जरिए करते हैं निर्देशों के बजाय, हमें शिक्षकों को समथ्र्य बनाने की जरूरत होती है, ताकि वे बच्चे को प्रेरित कर सकें और चीजें उसके लिए वाकई मायने रखती हैं, उसे संप्रेषित कर सकें। फिर एक बच्चा निश्चित रूप से बैठकर आपकी बात सुनेगा और हर स्कूली प्रणाली एक उपयोगी प्रक्रिया बन सकती है।
    शिक्षा का उद्देशय बुद्धि को सक्रिय करना है, जिससे वह हालातों के अनुकूल ढल सके और वह करें जो उपयुक्त है। बुद्धि का मूल तत्व यही है। मगर आजकल की शिक्षा प्रणालियां बुद्धि को किसी न किसी रूप से अनुकूलित करने की कोशिश कर रही हैं। अगर इंसानी बुद्धि अपना इस्तेमाल करे, तो हर छोटी सी चीज अपने आप में एक नया ब्रह्माण्ड बन जाएगी। इंसान दुनिया में इसलिए मौजूद हैं, क्योंकि वे जीवन को इस प्रकार बेहतर बना सकते हैं, जिस तरह कोई दूसरा कोई प्र्राणी नही कर सकता। मगर फिलहाल हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण हमारा आर्थिक इंजन है। किस चीज से हम अधिक से अधिक पैसे कमा सकते हैं? यह मूलभूत प्रश्न है। अगर इसे हम अपनी शिक्षा प्रणाली से नहीं हटाएंगे, तो यहां शिक्षा नहीं हटाएंगे, तो यहां शिक्षा नहीं, सिर्फ उत्पादन होगा। शिक्षा कोई उत्पादन नहीं है। यह एक जैविक प्रक्रिया है। हम जिस समाज में रहते हैं, उससे अलग शिक्षा प्रणाली नहीं बना सकते। क्या हम एक तौर पर ऐसा इको-सिस्टम विकसित करने के लिए तैयार हैं, जो बच्चे को यह उस बेहतरीन रूप में विकास करने में मदद कर सकेगा। हम सभी को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए। क्या हम वह करेंगे, जो करना चाहते हैं? या हम जागरूक होंगे कि हमारा हर कदम कैसे भावी पीढ़ियों पर असर डालेंगा? इस बसत पर ध्यान देना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक बच्चे की शिक्षा सिर्फ एक शिक्षक, माता-पिता या स्कूल का काम नहीं है, यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है।



               (ईशा विद्या फाउंडेशन की दसवीं सालगिरह  पर सद्गुरू के संदेश से)
                साभार- अमर उजाला

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