उच्च शिक्षा को चाहिए सक्षम नेतृत्व

भारत में उच्च शिक्षा एक बार फिर अपनी समस्याओं से उबरने की कोशिश कर रही है। इन समस्याओं में प्रमुख है आर्थिक संकट, पाठ्यक्रमों की अप्रासांगिकता, विश्वविधालयों में छात्र एवं प्रशासन के बीच टकराव, योग्य शिक्षकों एवं छात्रों का अभाव। कई विश्वविधालयों में अभी भी दशकों पुराने पाठ्यक्रम पढ़ाए जा रहें है। उच्च शिक्षा योग्य एवं सक्षम शैक्षिक नेतृत्व के संकट से भी दो चार हो रहें है। ऐसे में उच्च शिक्षा में नवाचार लाने एवं उसे विश्व स्तर के उत्कृष्ट शिक्षा संस्थानों के समकक्ष खड़ा करने की चुनौतियां खड़ी हो गई है। दुख की बात है कि हम उच्च शिक्षा को विश्व स्तरीय बनाने की चिंता करने के बजाय छिटपुट सुधारों पर ही ज्यादा बल देने में अपने सारी ऊर्जा लगा दे रहें है। सच्चाई यह है कि आज शिक्षा का हमारा घर टूटा-बिखरा हुआ है। उम्मीद की जाती है कि नई शिक्षा नीति में इसे संवारने और नया आकार देने के बारे में सोचा गया होगा।
   


आज भारतीय उच्च शिक्षा की एक बड़ी जरूरत है-योग्य एवं अकादमिक रूप से बेहतरीन शैक्षिक नेतृत्व का विकास। वर्तमान में तमाम विश्वविधालयों में युवा आंदोलित है। छात्र-प्रशासन के बीच तनाव, हिंसा-टकराव आम बात हो गई है। इसके अलावा पाठ्यक्रमों में नवाचार लाने, योग्य फैकल्टी एवं छात्र समुदाय के विकास की चुनौतियां भी विश्वविधालय शिक्षा के सामने मुंह बाए खडी है। अगर विश्वविधालयों को अच्दे एवं योग्य कुलपति मिलें तो इससे उनकी आधी समस्याएं हल हो सकती हैं। भारतीय उच्च शिक्षा को एक ऐसे शैक्षिक नेतृत्व की जरूरत है जिसके पास उच्च अकादमिक प्रतिमान एवं ठोस प्रशासनिक निर्णय लेने के साथ ही बढ़ती संवादहीनता को दूर करने के गुण हों। उच्च शिक्षा को ऐसा शैक्षिक नेतृत्व देने में राज्यपालों की बड़ी भूमिका हो सकती है। जहां भी संवेदनापूर्ण शैक्षिक समझदारी वाले राज्यपाल एवं उनके अकादमिक सलाहाकार मंडल है वहां बेहतर कुलपति बनाए गए हैं उनमें बेहतर माहौल बनाने में मदद मिली है। आज इसकी कहीं जरूरत है कि हिंदी पट्टी के विश्वविधालय अपना खोया हुआ गौरव फिर से हासिल करें। अच्छा यह है कि हिंदी पट्टी में कई अनुभवी राजनेता राज्यपाल पद पर है। उनके पास लंबा अनुभव विधमान है। ऐसे में पहली उम्मीद हमें ऐसे राज्यपालों से जगती है।
 


  पाठ्यक्रमों मे समय के अनुरूप सतत परिवर्तन उच्च शिक्षा में नवाचार लाने में हमारी बड़ी मदद कर सकता है। हमारे यहां अनेक विश्वविधालयों में पिछले 40-50 वर्षों में पाठ्यक्रमों मे बदलाव नहीं किए गए है। जबकि हमें स्थानीय लोक समाज वहां की भाषा, संस्कृति, वहां के उद्योग, स्थानीय तकनीकी एवं अन्य जरूरतों के आधार पर पाठ्यक्रमों में सतत बदलाव करते रहना चाहिए। इन बदलावों में हमें स्थानीयता एवं वैश्विकता, दोनों ही परिप्रेक्ष्य को शामिल करना चाहिए। आज भारत में विकसित हो रहा उधोग जगत अपनी जरूरतों के आधार प्रशिक्षित युवा वर्ग की तलाश कर रहा है और हमारी उच्च शिक्षा बिना इसकी परवाह किए पुरानी लय में बढ़ती जा रही है। आज उच्च शिक्षा को स्थानीय, वैश्विक, सामाजिक एवं औधोगिक जरूरतों के मुताबिक नया रूप देने की आवश्यकता है। दुनिया के बड़े विश्वविधालयों में लगभग हर साल शिक्षक अपने पाठ्यक्रमों में नवाचारगामी बदलाव करते रहते है। हमारे यहां पाठ्यक्रम बदलाव की प्रक्रिया पर नौकरशाही की पकड़ इतनी मजबूत है कि वह हमारी ऊर्जा एवं समय का अच्छा खासा भाग ले लेती है। हमें अपने विश्वविधालयों मे ंपाठ्यक्रम बदलवाने की प्रक्रिया को सरल एवं सहज बनाना ही होगा।
 


  हमारे विश्वविधालय परिसर युवा आक्रोश के केंद्र बनते जा रहें हैं। अगर हम उच्च शिक्षा में नवाचार लाएं तो मनोवैज्ञानिक स्तर पर युवाओं को शांत करने में मदद मिलेगी। उच्च शिक्षा के संस्थानों में जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर होने से भी मनोवैज्ञानिक स्तर पर युवाओं मे उपेक्षा की भावना को खत्म करने में मदद मिलेगी, जो हमारे युवओं में कई बार आक्रोश का बड़ा कारण बनती है। जब हमारे छात्र महसूस करेंगे कि उनकी इस शिक्षा की प्रासंगिकता है और नौकरी-बाजार मे उसका महत्व रखेंगे। विश्वविधालय एवं काॅलेज परिसर में हमारे शैक्षिक नेतृत्व का अपने छात्र समुदाय के साथ सकारात्मक संवाद भी शिक्षा परिसरों को तनाव, टकराहट एवं हिंसा से उबार सकेगा।
   


उच्च शिक्षा में बढ़ते संकट के प्रति सबको सजग होना होगा। सरकारी शिक्षा संस्थानों का बेहतर होना गरीबो, मध्यवर्ग, दलितों, उपेक्षितों के लिए प्राणवायु की तरह है। सरकार शिक्षा संस्थाओं के कमजोर होने से ही देश में निजी क्षेत्र के विश्वविधालयों की संख्या बढ़ती जा रही है। उनके इन्फ्रास्ट्रक्चर एवं वेतन के बड़े पैकेज सरकारी विश्वविधालयों के भी नामी-गिरामी शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं को आकर्षित करते जा रहें है। ऐसे में हमें शिक्षा व्यवस्था के भीतर बढ़ रही कमजोरी को जल्द से जल्द दूर करना होगा। (लेखक गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज के निदेशक है)


लेखक- बद्री नारायण
साभार जागरण

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