राजनीति से मुक्त हो उच्च शिक्षा

बद्री नारायण ने अपने आलेख ‘उच्च शिक्षा को चाहिए सक्षम नेतृत्व’ में ‘तमा विश्वविधालयो’ में युवाओं के आंदोलित होने के पीछे कारण बताया है कि पाठ्यक्रम के 40-50 वर्षो में कोई बदलाव न होने के कारण उन्हें उधोगों में कोई रोजगार नहीं मिलता, जिस कारण वे उपेक्षित अनुभव करते है और इसलिए अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए आंदोलन का रुख अख्तियार करते हैं। जेएनयू और जामिया मिलिया के विधार्थियों के समक्ष रोजगार का कौनसा संकट है? जेएनयू से तो प्रत्येक वर्ष 30-40 छात्र आइएएस में ही चले जाते हैं। उससे कई गुना अधिक अपने ही विश्वविधालय में अध्यापक या शोधार्थी बनकर कई वर्षों तक का सुरक्षित भविष्य पा लेते है। जामिया मिलिया वालो को भी कोई बेेरोजगारी नहीं भुगतनी पड़ती । तो फिर वर्तमान आंदोलन को कोई दूर का रिश्ता रोजगार अथवा पाठ्यक्रम के सुधार से दिखता नहीं। यह तो सीएए को लेकर है। वामपंथियों तथा मजहबी उन्मादियों ने सीएए का ऐसा काल्पनिक डर इन युवाओं में भर दिया है कि वे बिना विवेक के आंदोलन और वह भी हिंसक आंदोलन को अंजाम दे रहे है। छात्र ऊर्जा का ऐसा विध्वंसक अपव्यय उन विपक्षी नेताओं के मनोनुकूल है, जो राजनीति के हाशिये पूरे जाते-जाते अभी-अभी बचे है। मुद्दों और कार्यक्रम के खालीपन को उन्होंने सीएए-विरोध से भर लिया है। राष्ट्रीय हित की बलि चढ़ती है तो चढ़े। बद्री नारायण निश्चय ही वास्तविकता से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं, जब वह कहते हैं कि भारतीय विश्वविधालयों में 40-50 वर्षों तक पाठ्यक्रम अपरिवर्तित रहते है। पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में प्रायः हर तीसरे बदलाव होते है। कई संस्थानों मे तमाम कंपनियां छात्रों को भर्ती करने के लिए स्वयं पहुंचती है।
अजय मित्तल, मेरठ
साभार जागरण

Comments (0)

Please Login to post a comment
SiteLock
https://shikshabhartinetwork.com