शिक्षा के प्रति दोहरी सोच

शिक्षा के प्रति दोहरी मानसिकता की सोच समाज में देखी जा रही है। इसका सटीक उदाहरण है उच्च शिक्षा में सरकारी व्यवस्था के प्रति मोह। प्रायरू देखा जाता है लोग अपने पाल्यों को प्राथमिक, माध्यमिक शिक्षा बेहतर एकेडमी में दिलाने के प्रति आतुर रहते हैं। उनमें प्राथमिक शिक्षा से नींव मजबूत करने की सोच होती है, लेकिन जब बात हाईस्कूल, इंटरमीडिएट के बाद की होती है तो, वही अभिभावक अपने पाल्यों को सरकारी कॉलेज दिलाने की पुरजोर कोशिश करते हैं। इसके प्रति चाहे उन्हें उस तमाम एकेडमी, जिससे उनके पाल्य अपने शिक्षा की प्राथमिक नींव मजबूत करके पहुंचे हों उससे ज्यादा रुपये क्यों न खर्च करने पड़े। प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर परिणाम हो, अंक इस आधार पर हों कि उनके पाल्य को सरकारी कॉलेज मिले। आखिर क्यों यही सोच उस समय नहीं होती जब प्राथमिक शिक्षा से लेकर माध्यमिक तक के लिए अध्ययन की आवश्यकता होती है। बावजूद इसके कि सरकार ने पूरी व्यवस्था दी है। उस समय अपने रूतबे की चिंता तो अभिभावक को होती ही है, बेहतर शिक्षा निजी स्कूलों में ही मिलती है यह सोच भी। कहीं न कहीं यह दोहरी मानसिकता को प्रमाणित करता हुआ दिखता है। उच्च शिक्षा में वही सरकार की व्यवस्था बेहतर हो जाती है, लेकिन प्राथमिक से लेकर माध्यमिक तक की शिक्षा में आखिर क्या खोट दिखता है। इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है। प्राथमिक स्तर से शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच रखने की आवश्यकता है। यदि कहीं खामियां हैं तो उसे सुधार की भी जरूरत है। सुधार स्वयं में करने के साथ सरकार के तमाम शैक्षणिक संस्थानों की व्यवस्था के प्रति भी जागरूक रहना होगा।


अजय नेगी, जोगीवाला, देहरादून।
साभार जागरण

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