नई शिक्षा नीति के प्रारूप की खामियां

नव संसाधन विकास मंत्रालय नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी एनईपी के संशोधित प्रारूप को अंतिम रूप देकर कैबिनेट के सामने रखने की तैयारी में है। उच्च शिक्षा के संदर्भ में देखें तो इस प्रारूप में आगामी चैथी औद्योगिक क्रांति के मद्देनजर एक नॉलेज सोसाइटी के साथ-साथ आर्थिक शक्ति के रूप में भारत की भावी रूपरेखा का खाका है, लेकिन शिक्षा जगत में इसे लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। उच्च शिक्षा के संदर्भ में यह प्रारूप महत्वपूर्ण तो है, लेकिन उसमें कुछ खामियां हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है। इनमें एक है एकल कार्यक्रम आधारित संस्थानों की जगह बहु विषयक पाठ्यक्रम चलाने वाले संस्थानों पर जोर। हमारे 51,000 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थानों में बड़ी तादाद एकल कार्यक्रमों पर केंद्रित है। इस विरुपित शिक्षा तंत्र के रूप में बीएड कॉलेज, इंजीनियरिंग, लॉ या मैनेजमेंट कॉलेज एकल अनुशासन वाले संस्थानों की भरमार है। प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालय हों या आधुनिक विश्वविद्यालय उनके अनुभव दर्शाते हैं कि बहु-विषयक शिक्षण-अनुसंधान संस्थान कितने उपयोगी साबित होते हैं।


नई शिक्षा नीति में एक अन्य अभिनव अनुशंसा है शुरुआत से ही शिक्षा-अध्ययन को विशेषज्ञता की ओर उन्मुख करने के बजाय बहुविषयक स्नातक शिक्षा पर बल देना। अर्थात कला और मानविकी के छात्रों को विज्ञान या व्यावसायिक विषयों के पाठ्यक्रम पढ़ने के अवसर दिए जाएंगे तो दूसरी तरफ विज्ञान एवं तकनीक, प्रोफेशनल और वोकेशनल स्नातक कार्यक्रमों यहां तक कि आइआइटी जैसे इंजीनियरिंग स्कूल में भी मानविकी-कला को एकीकृत किया जाएगा। प्राचीन भारतीय परंपरा में 64 कलाओं के ज्ञान की जो चर्चा होती है वह इसी समन्वित और समग्र ज्ञान को रुपायित करती है। इन 64 कलाओं में संगीत, साहित्य और कला आदि से लेकर इंजीनियरिंग, चिकित्सा एवं गणित जैसे वैज्ञानिक विषयों के साथ-साथ कारीगरी-शिल्पकारी भी शामिल थे। आज अमेरिका-यूरोप में स्नातक स्तर की शिक्षा इस प्राचीन भारतीय पद्धति से बहुत मिलती-जुलती है जिसे वे गर्व से ‘लिबरल आर्ट्स’ कहते हैं। नवीनतम शोध भी दिखाते हैं कि मानविकी और विज्ञान आदि को एकीकृत करने वाली ऐसी स्नातक शिक्षा के परिणाम अत्यंत सकारात्मक होते हैं जो रचनात्मकता, उच्च स्तरीय चिंतन, समस्या-समाधान की क्षमता, टीम वर्क, संचार कौशल आदि की दृष्टि से अत्यंत सहायक हैं। एनईपी के मसौदे में एक सर्वेक्षण का हवाला है कि औसत वैज्ञानिकों की तुलना में नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों में कलात्मक शौक तीन गुना अधिक था। उच्च शिक्षा प्रणाली में सामुदायिक जुड़ाव, समाज सेवा और विकास आदि को शामिल करने का भी एक प्रस्ताव मसौदे में है। शिक्षा के अभिन्न अंग के रूप में छात्रों को स्थानीय उद्योग, व्यवसायों, कलाकारों, शिल्पकारों या प्रोफेसरों आदि के साथ इंटर्नशिप के अवसर प्रदान किए जाएंगे ताकि छात्र सैद्धांतिक के साथ ही व्यावहारिक ज्ञान से भी लैस हो सकें ताकि उनकी उत्पादकता और क्षमता में सुधार हो। पश्चिमी देशों में यह व्यवस्था कायम है।


प्रारूप की एक सिफारिश है कि विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों के स्नातक कार्यक्रमों में दाखिले के लिए अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं को खत्म करके नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) के माध्यम से एक परीक्षा हो। इससे विद्यार्थियों को अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं के बोझ से मुक्ति मिलेगी जिससे समय, धन और ऊर्जा तीनों की ही बचत होगी, लेकिन यहां यह भी जरूरी है कि प्रवेश में 12वीं परीक्षा के अंकों की भी अनदेखी न हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि एनटीए बहु-विकल्पीय प्रारूप में परीक्षा लेगा जबकि 12वीं की परीक्षा में बोध पर आधारित सब्जेक्टिव प्रश्न भी होते हैं। ऐसे में संतुलित दृष्टि यही होगी कि प्रवेश में दोनों के अंकों को शामिल किया जाए। प्रारूप का एक बिंदु थोड़ा भ्रामक है कि स्नातक की डिग्री या तो तीन अथवा चार साल अवधि की होगी। फिर तो विभिन्न संस्थान अपनी मर्जी से स्नातक पाठ्यक्रम चलाएंगे। इससे अराजक स्थिति उत्पन्न होगी। चाहे इंग्लैंड जैसी तीन वर्षीय अथवा अमेरिका की तर्ज पर चार वर्षीय पाठ्यक्रम चलें, लेकिन यहां देश में एकरूपता जरूरी है। अमेरिका की तरह का चार वर्षीय पाठ्यक्रम अधिक उपयोगी होगा, क्योंकि यह ज्यादा शोधपरक होने के साथ उच्च शिक्षा के लिए बेहतर आधार तैयार करता है।


इस प्रारूप में व्यावसायिक शिक्षा पर काफी जोर दिया गया है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार 19 से 24 आयु वर्ग में भारतीय कार्यबल का केवल पांच प्रतिशत व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करता है जबकि विकसित देशों में यह बहुत ज्यादा है। अमेरिका में यह 52 प्रतिशत, जर्मनी में 75 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया 96 प्रतिशत तक है। भारत में इस कमी का एक प्रमुख कारण यह है कि अब तक व्यावसायिक शिक्षा मुख्य रूप से आठवीं से लेकर 11वीं-12वीं तक केंद्रित रही है। प्रारूप में भारतीय मूल्यों के अनुरूप शिक्षा का व्यावसायीकरण न हो, इसकी निगरानी के लिए भी प्रावधान है। निजी क्षेत्र के संस्थानों में बेलगाम बढ़ रही फीस और मुनाफाखोरी के मद्देनजर यह बिंदु बहुत महत्वपूर्ण है कि नई नीति में निजी संस्थानों की फीस के निर्धारण पर नजर रखी जाएगी, लेकिन इसका कोई स्पष्ट खाका नहीं दिया गया है। ऐसे में बेहतर होगा कि लागत अनुपात में फीस की एक अधिकतम सीमा निर्धारित की जानी चाहिए ।


इसमें एक अहम बिंदु अध्ययन-अध्यापन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं अन्य तकनीक का अधिकाधिक उपयोग का है ताकि समय, संसाधन और श्रम का अधिकतम इस्तेमाल हो सके। शिक्षकों के संदर्भ में एक नई बात यह है कि पदोन्नति और वेतन-वृद्धि आदि के लिए उनके शिक्षण और शिक्षाशास्त्र में नवाचार, शोध की गुणवत्ता और प्रभाव, पेशेवर क्रियाकलाप जैसे मापदंडों के अलावा सहकर्मियों और छात्रों द्वारा भी समीक्षा कराई जाएगी। सहकर्मियों-छात्रों द्वारा समीक्षा सैद्धांतिक रूप से जितनी उचित लगती है, व्यावहारिक रूप से यह उतनी ही विवादास्पद होगी। यह कई पहलुओं को प्रभावित कर सकती है जो अंततरू पूरे शैक्षणिक माहौल को खराब करेगी। सहकर्मी और छात्रों द्वारा समीक्षा सही कदम नहीं होगा। नई शिक्षा नीति में उपरोक्त सीमाओं को दूर कर लिया जाए तो इसमें संदेह नहीं कि यह नए भारत के निर्माण की आधारशिला सिद्ध होगी।


(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)


लेखक - निरंजन कुमार
साभार - जागरण

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