उच्च शिक्षा में गुणवत्ता

उत्तराखंड में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। तमाम प्रयास के बावजूद हालात में सुधार नजर नहीं आ रहा है। दरअसल, इसका प्रमुख कारण सियासत भी है। ताजा मामला ब्लाक और विधानसभा क्षेत्रों में डिग्री कॉलेज खोलने का है। बताया जा रहा है कि 20 ब्लॉकों और 15 विधानसभा क्षेत्रों में डिग्री कॉलेज नहीं हैं। ऐसे में माननीयों की ओर से सरकार पर डिग्री कॉलेज खोलने का दबाव है। सरकार ने उच्च शिक्षा महकमे को प्रस्ताव तैयार करने को कह दिया है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि दो सौ से कम छात्रसंख्या वाले डिग्री कॉलेजों को नजदीकी कॉलेजों में मर्ज करने पर विचार किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब स्थिति इस कदर गंभीर है तो नए डिग्री कॉलेज खोलने का औचित्य क्या है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की स्थिति सचमुच दयनीय है। छात्र-छात्रओं को उच्च शिक्षा के लिए देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल अथवा हल्द्वानी का रुख करना पड़ता है। इसकी वजह सिर्फ कॉलेज की कमी भर नहीं है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता भी है। उत्तराखंड गठन के बाद सरकारों ने दूरदराज के इलाकों में कॉलेज तो खोल दिए, लेकिन आधारभूत ढांचा विकसित करने को लेकर वैसी तत्परता नहीं दिखाई दी, जैसी कि होनी चाहिए थी। अब आलम यह है कि कई इलाकों में दो से तीन कमरों के भवन में डिग्री कॉलेजों का संचालन किया जा रहा है। कॉलेज में फैकल्टी का अभाव तो है ही, छात्रों को अपने पसंदीदा विषय के अध्ययन की सुविधा भी नहीं है। यहां तक कि पुस्तकालय और प्रयोगशाला तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है। हालात यह है कि प्रदेश में सरकारी डिग्री कॉलेजों की संख्या 104 का आंकड़ा पार कर चुकी है, बावजूद इसके कॉलेजों में न्यूनतम 180 दिन पढ़ाई नहीं हो पा रही है। गुणवत्ता की कसौटी पर उत्तराखंड के कॉलेज की क्या स्थिति है नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआइआरएफ) की रैंकिंग से समझा जा सकता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की और भारतीय प्रबंधन संस्थान काशीपुर को छोड़कर शायद ही कोई संस्थान टॉप-100 में जगह बना पाया हो। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सियासी दखलंदाजी हालात को पेचीदा बना रही है। विश्वविद्यालयों में न सिर्फ मानव संसाधन की कमी है, बल्कि आए दिन होने वाले विवाद भी इनकी छवि धूमिल कर रहे हैं। जाहिर है जरूरत कॉलेज खोलने से ज्यादा गुणवत्ता पर ध्यान देने की है।


साभार जागरण

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