शिक्षा और रोजगार से ही थमेगी आबादी वृद्धि दर

गत सप्ताह यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड की वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट 2019 जारी हुई। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 10 से 24 वर्ष की आयु की 36.5 करोड़ युवा आबादी रहती है, यह अमेरिका की कुल आबादी से कहीं ज्यादा है। वर्ष 2020 में भारत की औसत आबादी 29 वर्ष होगी, भारत दुनिया का सबसे युवा देश हो जाएगा, लेकिन जहां तक नीति की बात है, तो युवा लोग दिखते हैं, गिने भी जाते हैं, लेकिन सुने नहीं जाते। युवा आबादी, विशेष रूप से गरीब, ग्रामीण, सीमांत समुदायों की लड़कियों के पास न तो ऐसी सूचनाएं हैं और न सेवाएं कि वे अपनी शिक्षा, करियर, यौन व प्रजनन अधिकार के बारे में फैसला ले सकें। क्या पढ़ना है, कब तक पढ़ना है, रोजगार के अवसर, कब शादी करनी है, और कितने बच्चे पैदा करने हैं, उन्हें नहीं पता।
महिलाएं और लड़कियां अपने रास्ते में कदम-कदम पर सामाजिक और आर्थिक अवरोधकों से जूझती हैं। भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 2015-16 के अनुसार, बमुश्किल किशोरवय से निकलते ही उनमें से ज्यादातर मां बन जाती हैं। करीब 27 प्रतिशत महिलाएं 18 वर्ष की होने से पहले ही बालिका वधू बन जाती हैं। 15 से 19 साल की मात्र 12 प्रतिशत लड़कियां आधुनिक प्रजनन रोधी उपायों का इस्तेमाल करती हैं। आठ प्रतिशत लड़कियां 19 वर्ष की होने तक बच्चे जनने लगती हैं। यौन शिक्षा एक और अपूर्ण एजेंडा है, जिसकी जरूरत युवाओं को है। निम्न स्तरीय राजनीतिक और सामाजिक विरोध के कारण यौन शिक्षा जैसे पारिभाषिक पद की जगह जीवन कौशल जैसे पद ने ले ली है। 10 से 14 वर्ष की भारतीय आबादी के लिए इंटरनेट और वाट्सएप पर साझा हो रहे वीडियो ही उनके लिए यौन सूचनाओं के अकेले स्रोत होते हैं, जो बहुधा सही नहीं होते। 15 से 24 आयु की विवाहित महिलाओं को गर्भ-निरोधक की जरूरत है, लेकिन उनमें से 22 प्रतिशत महिलाएं इनसे वंचित रहती हैं। यहां तक कि 15 से 49 की उम्र की 12.9 प्रतिशत विवाहित महिलाओं को भी जरूरत के समय गर्भ निरोधक उपलब्ध नहीं होते।


कोई आश्चर्य नहीं, देश की जनसंख्या वर्ष 2060 से 2070 के बीच चीन को पार करके 1.7 अरब पहुंच जाएगी। देश के विकास के लिए श्रम शक्ति में युवाओं और विशेष रूप से महिलाओं की ज्यादा भागीदारी जरूरी है, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। सांख्यिकीय और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अनुसार, 15 से 29 वर्ष के हर तीन पुरुष में से दो से भी कम वर्ष 2012 में श्रम शक्ति का हिस्सा थे। इस आयु वर्ग में ग्रामीण आबादी के 63 प्रतिशत और शहरी आबादी के 60 प्रतिशत ही श्रम शक्ति का हिस्सा थे। इस आयु वर्ग की महिलाओं में 18 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं और 16 प्रतिशत शहरी महिलाएं ही श्रम शक्ति का हिस्सा थीं।


सांख्यिकीय और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि विगत 25 वर्षों में बहुत कुछ हासिल हुआ है। प्रजनन स्वास्थ्य के क्षेत्र में तरक्की हुई है। यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड के भारत स्थित कार्यालय के प्रभारी व क्षेत्रीय सलाहकार क्लॉज बेक बताते हैं, जहां भारत में प्रति महिला औसत प्रजनन दर वर्ष 1971 के 5.2 मुकाबले 2.3 हो गई है, वहीं गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल वर्ष 1969 के नौ प्रतिशत के मुकाबले वर्ष 2019 में बढ़कर 54 प्रतिशत हो गया है। इतने बड़े पैमाने पर बदलाव आसान नहीं, भारत ने प्रतिबद्धता दिखाते हुए प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं में अपना धन लगाया है।


महिला स्वास्थ्य के लिए सक्रिय एक स्वयंसेवी संगठन की समन्वयक अदसा फातिमा कहती हैं, चुनौती सेवा के अंतिम चरण में है। अब भी बधियाकरण करवाने वालों में 93 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि पुरुषों का बधियाकरण ज्यादा सुरक्षित, त्वरित और आसान है। सुरक्षित गर्भपात सेवाओं का भी अभाव है। यह दोहराने की जरूरत नहीं कि गर्भ-निरोधन और परिवार नियोजन सेवाओं से परिवार का आकार छोटा होता है। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यक्रम निदेशक पूनम मुतरेजा कहती हैं, गरीबों और अमीरों में वांछित परिवार आकार 1.8 बच्चों का है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश ने अभी वांछित जन्म दर हासिल नहीं की है। वांछित जन्म दर हासिल करने के लिए विशेष रूप से युवाओं को शिक्षा-रोजगार देने का लक्ष्य बनाकर काम करने में तेजी लानी पड़ेगी।


संचिता शर्मा
हेल्थ एडीटर, हिन्दुस्तान टाइम्स
साभार हिन्दुस्तान

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