ताकि सरकार के साथ मिलकर काम करने में सफल हो सकें

वह तब करीब हजार करोड़ के मालिक थे, और उन्होंने हाल ही में शिक्षा पर केंद्रित एक परोपकारी पहल की थी। वह यह सलाह चाहते थे कि इस क्षेत्र में सरकार के साथ मिलकर कैसे प्रभावी काम किया जा सकता है? उन्होंने बड़े सब्र के साथ मेरी बातें सुनी थीं। कुछ महीने बाद मुझे यह सुनने को मिला कि उन्होंने एक सूबे के मुख्यमंत्री के साथ इससे संबंधित सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, और जल्दी ही तीन अन्य राज्यों के साथ उनका करार हुआ।
इस बात को कुछ ही साल हुए हैं। आम तौर पर उनका प्रयास धूल फांकता हुआ दिखा और उसके बारे में शिक्षकों व अधिकारियों की टिप्पणियां भी नकारात्मक ही मिलीं। उनकी कोशिशों का यह हश्र देखकर मुझे बेहद अफसोस हुआ। उन्होंने काफी नेक इरादे और काफी सारे धन के साथ वह पहल की थी। फिर गलती कहां हुई? यकीनन, इसकी कई वजहें रही होंगी। मगर दो कारण मुझे साफ-साफ दिखे। पहला, उनके शिक्षा कार्यक्रमों की सोच ही गलत थी, जिसकी तफसील में मैं यहां नहीं जाऊंगा। दूसरा कारण था, सरकार के साथ काम करने का उनका दोषपूर्ण तरीका। और यह गड़बड़ी बुनियादी स्तर पर ही थी, जिसे उन्हें अपने कारोबारी तजुर्बे से पकड़ना चाहिए था। इसके लिए किसी सलाह की जरूरत ही नहीं थी।
उनका काम करने का तरीका पूरी तरह से ऊपर से नीचे की ओर था। उन्होंने यह सोचा कि उन्होंने मुख्यमंत्री के साथ सहमति-पत्र पर दस्तखत किए हैं, इसलिए पूरा सरकारी अमला और स्कूल प्रशासन उनके कार्यक्रमों को कामयाब बनाने में जुट जाएगा। एक कारोबारी संस्थान में भी सीईओ के अनुमोदन के बावजूद सभी स्तर के लोगों को अपने साथ जोड़ना काफी अहम होता है। यह एक बुनियादी चूक थी, जो उन्होंने अपने व्यापार में नहीं की थी। शायद उन्होंने इस सोच के तहत कदम बढ़ाया कि ‘मुख्यमंत्री ने मेरे कार्यक्रम का अनुमोदन कर दिया है, और चूंकि यह सत्कार्य मैं लाभ कमाने की मंशा से नहीं कर रहा, इसलिए सबको मेरे कार्यक्रम को सफल बनाना चाहिए।’
यह हकदारी इस बात को नजरअंदाज कर देती है कि स्कूल सिस्टम से जुडे़ लाखों शिक्षकों व अधिकारियों ने अपनी पूरी जिंदगी इसी अच्छेे उद्देश्य से होम कर रखी है। किसी भी परोपकारी इंसान की पहल एक अतिरिक्त मदद भर है और इन शिक्षकों व अधिकारियों के मुकाबले उनकी कोशिश बहुत छोटी है। फिर शीर्ष से नीचे वाली सोच दरअसल जमीनी फीडबैक की संभावना को खत्म कर देती है। काफी सारे लोग यह सवाल पूछते हैं कि ‘आखिर सरकार के साथ मिलकर कैसे कोई प्रभावशाली काम किया जाता है?’ ऐसा पूछने वालों में सिर्फ परोपकार से प्रेरित लोग नहीं होते, बल्कि उद्योगपति भी होते हैं, जो कॉरपोरेट क्षेत्र की सामाजिक जिम्मेदारी के अपने कार्यक्रमों को लेकर उत्सुक होते हैं। इस सवाल के जवाब में मैं देश भर में सरकार के साथ मिलकर काम करने के अपने करीब 20 वर्षों के अनुभव पर कुछ बातें बता सकता हूं।
पहली तो यही कि ‘सरकार’ एक चट्टानी रुकावट है जैसी धारणा वास्तव में बेमानी है। सच यह है कि आपको इंसानों के साथ मिलकर काम करना होता है, न कि चट्टानों के साथ। इन लोगों में आपको तरह-तरह की योग्यताएं व क्षमताएं मिलेंगी। दूसरी, आपको कामकाजी रिश्ता सभी स्तरों पर कायम करना होगा। सहमति-पत्रों की उपयोगिता बहुत सीमित होती है। राजनेताओं व वरिष्ठ अधिकारियों (अक्सर आईएएस) के साथ मिलकर काम करना ही पर्याप्त नहीं, आपके लिए जिला, प्रखंड व समूह के स्तर पर काम करना बहुत जरूरी है। तीसरी, अधिकारियों की एक बड़ी संख्या काफी स्मार्ट है, वे बहुत मेहनत से काम करते हैं। चौथी, विनम्रता कभी न छोड़ें। सरकार को जिस जटिलता से जूझना पड़ता है, और जिससे आपका भी सामना होना है, वह किसी कारोबार से अधिक नाटकीय है। ऐसे में, सरकारी अफसरों का दशकों का तजुर्बा काफी उपयोगी साबित होता है। इसी तरह, आपके पास कुछ विशेषज्ञ भी होने चाहिए। अपने काम का श्रेय लेने की चाहत से भी बचें। मीडिया परोपकारियों को अपने तईं पेश करता रहता है।
जाहिर है, इन बिंदुओं पर काम करने के लिए अमिभान छोड़ना पड़ेगा, जो पुरानी कामयाबियों के बाद किसी में सहज घर कर जाता है।


                                 लेखक - अनुराग बहर, सीईओ, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन
                                 साभार - हिन्दुस्तान

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