नीट में मात खा गए दक्षिण के राज्य

भारत में औसतन 2,000 की आबादी पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। इनमें से भी 80 फीसदी चिकित्सक शहरों में रहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के मुताबिक, प्रति 1,000 की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, भारत में पांच लाख डॉक्टरों की कमी है। मगर देश भर के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए आयोजित ‘नेशनल एलिजबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट’ यानी ‘नीट’ के जरिये सफल हुए विद्यार्थियों में से करीब 64,000 विद्यार्थियों को ही एमबीबीएस कोर्स में दखिला मिल सकेगा।
बहरहाल, पिछले हफ्ते घोषित नीट का नतीजा तमिलनाडु के लिए चौंकाने वाला रहा है। यहां का कोई भी छात्र शीर्ष 200 में जगह नहीं बना सका। जिस छात्र ने सबसे ज्यादा अंक हासिल किए, उसका स्थान 261वां है। पड़ोसी राज्य केरल के तीन छात्र शीर्ष 25 में रहे, जबकि कर्नाटक में बेंगलुरु के एक छात्र ने चौथा स्थान हासिल किया। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का कोई छात्र शीर्ष 10 में नहीं रहा, मगर वहां के भी 22 छात्र शीर्ष 100 में जगह बनाने में सफल रहे। पंजाब के छात्र ने इस परीक्षा में जहां टॉप किया है, वहीं दूसरे और तीसरे स्थान पर मध्य प्रदेश के छात्रों ने कामयाबी दर्ज की।
इस नतीजे से तमिलनाडु में निराशा है। जाहिर है, इसके लिए राज्य सरकार मुख्य रूप से दोषी है। लगातार दो साल तक नीट का विरोध करने के बाद राज्य सरकार ने वादा किया था कि इस साल भी छात्रों को छूट मिलेगी। इसके लिए राज्य के मंत्री दिल्ली और चेन्नई के बीच उड़ते रहे, जिससे छात्रों में यह झूठी धारणा बनी कि 12वीं के रिजल्ट के आधार पर ही उन्हें मेडिकल सीटें मिल जाएंगी। इसीलिए वे या तो पूरी तरह तैयार नहीं हुए या फिर उन्होंने पूरी तैयारी नहीं की।
अपने देश में डॉक्टरों की मांग व आपूर्ति में भारी अंतर कोई छिपी हुई बात नहीं है। इस अंतर को पाटने के लिए यह जरूरी है कि देश की शिक्षा नीति में एक तरफ उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और एकरूपता लाने पर ध्यान दिया जाए, तो दूसरी तरफ इसमें क्षेत्रीय संतुलन भी साधा जाए; खासतौर से उन छात्रों के लिए अवसर बढ़ाए जाएं, जो छोटे कस्बों व गांवों में रहते हैं और डॉक्टर बनकर अपने गांव-समुदाय की सेवा करने की महत्वाकांक्षा रखते हैं।
अगर तमिलनाडु के संदर्भ में नीट के नतीजों का ही उदाहरण लें, तो केंद्र व राज्य, दोनों सरकारों ने राज्य के छात्रों को निराश किया है। शिक्षा चूंकि समवर्ती सूची में शामिल है, इसीलिए यह केंद्र व राज्य, दोनों की साझी जिम्मेदारी है कि वे इस संदर्भ में न्यायसंगत नीतियां बनाएं और उन्हें लागू करें। हमारा संविधान भी कहता है कि समवर्ती सूची में शामिल विषयों में ‘एकरूपता अपेक्षित है, पर अनिवार्य नहीं’। सीबीएसई के माध्यम से नीट आयोजित करके केंद्र ने एकरूपता और गुणवत्ता बेहतर करने का प्रयास तो किया, मगर इस प्रक्रिया में ग्रामीण छात्रों की उचित भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो सकी, खासतौर से उन छात्रों की, जिन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई की है।
अंग्रेजी और हिंदी के अलावा इस साल नीट आठ क्षेत्रीय भाषाओं में भी आयोजित की गई थी। 80 फीसदी से अधिक छात्रों ने अंग्रेजी माध्यम में, 10.5 फीसदी ने हिंदी में और महज 9.25 फीसदी छात्रों ने क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा दी। इनमें से भी 4.20 फीसदी छात्र गुजराती में, तीन फीसदी बांग्ला में और 1.33 फीसदी तमिल में शामिल हुए। तेलुगु, कन्नड़ व मलयालम में यह संख्या नगण्य ही थी। फिर क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा देने वाले छात्रों को दोतरफा मुसीबतें झेलनी पड़ीं। अव्वल तो सीबीएसई आधारित सिलेबस संभालना उनके लिए मुश्किल था, और फिर उनकी यह भी शिकायत रही कि क्षेत्रीय भाषाओं के सवाल कहीं अधिक कठिन थे। एक छात्र तो इस मसले को मदुरै हाईकोर्ट भी ले गया, पर उसे कोई राहत नहीं मिली।
इस समस्या को समझना ज्यादा कठिन नहीं है। असल में, 11वीं और 12वीं कक्षा में राज्य व केंद्रीय बोर्डों के ऐसे पाठ्यक्रम हैं कि पाठ्य पुस्तकों में भारी अंतर है। मसलन, अगर राज्य बोर्ड की किताब में कोई प्रसंग एक पैराग्राफ में बताया गया है, तो वही एनसीईआरटी या सीबीएसई की प्रस्तावित किताबों में चार पेज में भी हो सकता है। मगर सबसे महत्वपूर्ण कारण शिक्षकों का पढ़ाने का तरीका है। तमिलनाडु में छात्रों को अवधारणा समझाने की बजाय रटाने पर जोर दिया जाता है, जबकि बेंगलुरु के चौथे टॉपर ने बताया है कि उसकी सफलता का राज ‘ढर्रे से अलग सोचना’ और अवधारणाओं के आधार पर सवालों के जवाब देना है।
राज्य बोर्डों और क्षेत्रीय छात्रों का प्रदर्शन उन छात्रों से काफी खराब है, जिन्होंने सीबीएसई पाठ्यक्रम में या अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाई की है। ऐसे कई छात्र हैं, जिन्होंने राज्य बोर्ड की परीक्षा में तो 90 फीसदी अंक हासिल किए, मगर वे नीट में सफल नहीं हो सके। कुछ शिक्षाविदों का तो यह भी कहना है कि क्षेत्रीय भाषाओं के कई प्रतिभाशाली छात्र इस प्रवेश परीक्षा में शामिल ही नहीं हुए। जैसे तमिल भाषा में महज 15,206 छात्र इस परीक्षा में शामिल हुए, जबकि इस भाषा में 12वीं पास करने वाले छात्रों की संख्या तीन लाख थी। जाहिर है, सभी छात्र डॉक्टर नहीं बनना चाहते, पर यह भी सच है कि जिन्होंने यह सपना पाला है, वे सब भी इसे पूरा करने में सफल नहीं हुए।
एक तरफ केंद्र एकरूपता का हिमायती है, तो वहीं राज्यों की सियासी जमातें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा या छात्रों के भविष्य के प्रति उदासीन हैं। शिक्षाविद उन स्कूलों की खूब तारीफ करते हैं, जिन्होंने सीबीएसई पाठ्यक्रम अपनाया है। हालांकि दिलचस्प तथ्य यह भी है कि पंजाब के जिस छात्र ने नीट में टॉप किया है, उसने राज्य बोर्ड के स्कूल में पढ़ाई की है।
दक्षिणी राज्यों के राजनेता व शिक्षाविद भले ही यह रोना रोते रहें कि ग्रामीण क्षेत्रों, खासतौर से राज्य बोर्डों के बच्चों के लिए अखिल भारतीय परीक्षाओं की स्थिति नुकसानदेह रहती है, मगर सच यह है कि इस स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने ज्यादा काम भी नहीं किया है। तमिलनाडु सरकार ने राज्य के छात्रों के लिए 85 फीसदी सीटें आरक्षित करने संबंधी कानून लाने का इरादा जताया है, जबकि जरूरत राज्य सरकारों के शिक्षा के स्तर पर ध्यान देने की है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो देश में डॉक्टरों की कमी बनी रहेगी और किफायती स्वास्थ्य सेवा पाने की हम जद्दोजहद करते रहेंगे।


                              लेखक - एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ तमिल पत्रकार
                              साभार - हिन्दुस्तान

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